नियोजित शिक्षकों की विकास यात्रा एवं जनता का दृष्टिकोण

 राजनीतिक दृष्टिकोण के मामले में बिहार के लोगों का जवाब नही , कहा जाता है कि यहा चाय की दुकान पर भी सटीक और तगरी राजनीति होती है। किंतु यहां के लोगों में दृष्टिकोण हर राजनीतिक दल को अपने-अपने नजरिए से देखने का एक अलग ही अंदाज है। और यह अपने दृष्टिकोण पर सदैव कायम रहते हैं चाहे वास्तविक स्थिति जो भी हो एक बार जो दृष्टिकोण इन्होंने अपना लिया फिर उसकी रक्षा ही उनका परम धर्म माना जाता है। इसीलिए बिहार को राजनीति करने में अब्बल माना गया यहां के लोग चाय की दुकान से राजनीति का जो निष्कर्ष निकाल दे 90% संभावना होती है कि वह सटीक हो किंतु आइए नजर डालते हैं इनके दृष्टिकोण और वास्तविक परिदृश्य पर उससे पहले पीपीपी मोड को समझते हैं पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप योजना 1995 में प्रस्तावित थी जिसे अटल बिहारी वाजपेई कि सरकार ने लागू किया एवं इसके तहत सरकारी कार्यों में सीधे तौर पर निजी करण को लाकर भारत को पूंजीवाद की तरफ धकेलने का श्री गणेश किया गया था इसका असर सिर्फ शिक्षा के क्षेत्र में ही नहीं हर क्षेत्रों में देखने को मिला ।



शिक्षा के क्षेत्र में जनता का व्यापक दृष्टिकोण


किसी राजनीतिक मंडली में हमारा सामना बिहार की आम जनता से हुआ जिनका बोलाना था शिक्षा के क्षेत्र में नीतीश कुमार बिहार में काफी स्कूल खोलें एवं बहुत सारे शिक्षकों की बहाली की अब वे किसी भी प्रकार से अपने भ्रमित दृष्टिकोण से बाहर नहीं निकल पा रहे हैं जबकि बिहार में शिक्षा का स्तर साल दर साल गिरता ही गया है किंतु शैक्षणिक परिणाम एवं विभिन्न बोर्डों की परीक्षा परिणाम में लगातार साल दर साल सुधार छात्रों के पासिंग परसेंटेज एवं उनके द्वारा प्राप्त किए गए प्राप्तांक में भी साल दर साल सुधार होता क्या है किंतु इसका शिक्षा के स्तर से कोई लेना देना नहीं है। अब एक नजर वास्तविकता पर डालीये यूनिसेफ के दबाव एवं अपने खर्चों में कटौती करने के इरादों से सरकार ने पीपीपी मोड के तहत जन लुभावनी योजना सर्व शिक्षा अभियान को लेकर आती है जिसके तहत काफी व्यापक स्तर पर स्कूल खोलना एवं शिक्षकों की भर्ती करना सन्निहित होता है।


पहले से बिहार में शिक्षकों के लिए कुल सृजित पदों का विवरण


आपको बता दिया बिहार में सर्व शिक्षा अभियान से पहले कुल राज्य शिक्षकों के सृजित पद 262000 थे जिनमें से वर्तमान में 1 लाख 73000 रिटायर हो चुके हैं और 89000 के आस-पास नियमित शिक्षक बिहार में बचे हुए हैं जो 2030 तक रिटायर हो जाएंगे। अब सरकार को होने वाले फायदे देखिए 2018 तक सरकार ने नियोजित शिक्षक के नाम पर बहाल किए गए शिक्षकों को ओने पौने सेवा राशि देकर उनसे सेवा लेती रही। 2018 के बाद सरकार ने नियोजित शिक्षकों के लिए वेतनमान निर्धारित किया किंतु अब भी एक राज्य शिक्षक के बदले 3 से 4 शिक्षकों को रखा गया है सरकार समय-समय पर जनता के दृष्टिकोण में खुद को श्रेष्ठ रखने के लिए 1500 रुपए से बहाल किए गए शिक्षामित्र जिनकी संख्या नियोजित शिक्षकों में सर्वाधिक है को आज एक सम्मानजनक वेतन तक लेकर आई है किंतु जनता के लोकप्रिय सरकार तो सदैव जनता के लिए अपनी लोकप्रियता कायम ही रखती है।

बिहार में पारा शिक्षक एवं शिक्षामित्रों की बहाली का प्रयोग

सर्व शिक्षा अभियान के तहत होने वाली शिक्षकों की व्यापक भर्ती एवं नए नए विद्यालयों के सृजन के लिए राज्य में कुल निर्धारित शिक्षकों के पद से दोगुनी पदों पर शिक्षकों को बहाल करना किसी भी राज्य सरकार के लिए एक चुनौती ही होगी जिस से निपटने के लिए वर्तमान सरकार 2003–4 में कुछ समय के लिए यानी 11 माह के लिए स्थानीय निकायों के द्वारा पारा टीचर यानी कि शिक्षामित्र को 1500 रुपए मेहनताने पर बहाल करती है ताकि सरकार को शिक्षकों की बहाली में कुछ समय मिल जाए। और साथ ही साथ 2003 में वर्तमान बिहार सरकार मुख्यमंत्री श्रीमती राबड़ी देवी की सरकार ने शिक्षकों की भर्ती में 34540 शिक्षकों की भर्ती के लिए विज्ञापन प्रसारित करती है ज्ञात हो कि 1999 में बीपीएससी के माध्यम से अंतिम शिक्षक बहाली सरकार के द्वारा कराई गई थी। उस समय के विज्ञापन के अनुसार 34540 एक बहुत बड़ी संख्या थी जिसके लिए बीटीसी और ट्रेंड शिक्षकों को बहाल करने के लिए उन्हें सीनियरिटी का लाभ दिया गया किंतु यह बहाली कोर्ट के चक्कर में आकर 2010 से प्रारंभ हुई जो अभी तक कहीं-कहीं नौकरशाहों के तानाशाही रवैया के कारण अटकी हुई है इसका भी श्रेय वर्तमान मुख्यमंत्री श्री नीतीश कुमार को ही मिला।

शिक्षा मित्र एवं पारा शिक्षक की तरक्की

राजनीतिक घटनाक्रम में होने वाले बदलाव के साथ बिहार की वर्तमान सरकार बदलने के साथ-साथ इन 11 माह के शिक्षकों को 33 महीने के लिए बढ़ा दिया जाता है। बिहार में लगे राष्ट्रपति शासन के उपरांत होने वाले दोबारा चुनाव में यह मुद्दा राजनीतिक दलों के लिए वोट बैंक का सुनहरा अवसर होता है क्योंकि शिक्षामित्रों की कुल संख्या बिहार में डेढ़ लाख के आसपास थी। राजनीतिक दल इसमें कामयाब भी होते हैं और उन्हें इसका फायदा राष्ट्रपति शासन के तुरंत बाद होने वाले 2005 के विधानसभा चुनाव में मिलती है और नीतीश कुमार को उनके किए गए वादे के अनुसार 2005 के राष्ट्रपति शासन से पहले वाले चुनाव से काफी ज्यादा सीट प्राप्त होती है।

पारा शिक्षक यानी शिक्षामित्र के नए सहयोगी के रुप में नियोजित शिक्षकों की नियुक्ति

सरकार विधानसभा चुनाव से पहले किए गए अपने वादों पर अटल रहती है और 15 सो रुपए पर बहाल सभी शिक्षामित्र यानी पारा शिक्षक को ₹4000 वेतन तथा 60 साल की सेवा की घोषणा कर देती है। परिणाम स्वरूप राज्य में पिछली सरकारों से खफा लाखों बीटीसी ट्रेंड शिक्षक अभ्यर्थियों में रोष व्याप्त हो जाता है। यहां भी वर्तमान मुख्यमंत्री माननीय श्री नीतीश कुमार जी को राजनीतिक फायदा नजर आता है और आगे होने वाली शिक्षक नियोजन में सिर्फ ट्रेंड अभ्यर्थियों को ही नियोजित करने के लिए नई नियमावली 2006 में जारी करते हैं जिनको पारा शिक्षक की तुलना में थोड़ा सा अधिक वेतन निर्धारित किया जाता है । इस घटनाक्रम में सरकार चाहे किसी की भी हो फायदा तो सरकार को ही है। कुछ नियोजन इकाई अपवाद स्वरूप पारा शिक्षक के पिछले पदों पर अनियमितता कर पुनः अनट्रेंड शिक्षकों को बहाल करने में कामयाब हो जाती है किंतु इनकी संख्या नगण्य होती है।

नियोजित शिक्षकों की गुणवत्ता में सुधार

यह वह दौर था जिसमें इस प्रकार के घटनाक्रम से बिहार में ही नहीं भारत के लगभग सभी राज्यों में देखने से मिले थे जिसके कारण शिक्षा के प्रति लेखकों एवं मीडिया में सरकार की आलोचना होने लगते हैं की पारा शिक्षकों की नियुक्ति से शिक्षा की गुणवत्ता खराब हो रही है केंद्र में मनमोहन सिंह की सरकार शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार लाने के लिए शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2009 लेकर आती है जिसके तहत यह प्रावधान किया जाता है कि ऐसे किसी भी शिक्षकों की बहाली नहीं की जाएगी जो अनट्रेंड हो तथा शिक्षक बनने के लिए योग्य नहीं हो उसके लिए शिक्षक पात्रता परीक्षा शिक्षक बनने के लिए अनिवार्य कर दी जाती है और साथ-साथ ही सरकारों को अंतिम बार अंतरिम शिक्षकों को बहाल करने का मौका व्यापक स्तर पर देती है जिसके तहत 2011 में बिहार शिक्षक पात्रता परीक्षा 2011 का आयोजन किया जाता है।

नियोजित शिक्षकों का असंतोष पूर्ण रवैया

बिहार शिक्षक पात्रता परीक्षा 2011 में लगातार विवादों में रहा और इस परीक्षा के उपरांत पास अभ्यर्थी भी राज्य शिक्षक के तौर पर नहीं बल्कि शिक्षक नियोजन के तहत पारा टीचर के रूप में ही बहाल किए गए । 2011 में टीईटी पास करो शिक्षक बने शिक्षक अभ्यर्थियों के द्वारा लंबी लड़ाई लड़ी गई जिसमें उनका मानना था कि उनके जैसे योग्य शिक्षकों को भी पारा शिक्षकों के तुल्य कर दिया गया है अतः वह समान काम समान वेतन की मांग करने लगे जिसे सरकार ने सिरे से खारिज कर दिया किंतु सरकार ने उनकी वेतन में एक सम्मानजनक वेतन मान लागू कर दिया जिससे वह खुश भी हो गए और वर्तमान में 2018 के बाद से शिक्षकों के लिए वेतनमान लागू किया गया है। सरकार किसी भी हाल में इन नियोजित शिक्षकों को राज्य शिक्षक का दर्जा नहीं दे सकती है क्योंकि कानूनी पेंच इस प्रक्रिया में बाधक बन कर खड़ा है जिसका जीता जागता उदाहरण उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव की सरकार ने लगभग दो लाख से अधिक पारा शिक्षकों को नियमित कर उन्हें नियमित वेतनमान का लाभ दिया जिसे हाईकोर्ट ने रद्द कर दिया क्योंकि इनकी बहाली स्थानीय निकायों के द्वारा की गई है राज्य की इकाइयों के द्वारा नहीं। कोर्ट के आदेश के बाद भी भिन्न-भिन्न राज्य की हाई कोर्ट में मतभेद है जैसे यूपी की हाईकोर्ट ने पारा शिक्षकों को नियमित किए जाने पर उन्हें तत्काल प्रभाव से निलंबित करना 10000 के वेतन पर लाकर खड़ा कर दिया वहीं बिहार के हाई कोर्ट में शिक्षक संघों के पक्ष में फैसला सुनाते हुए सरकार को यह निर्देश दिया कि समान काम के बदले समान वेतन दे जिसे पुनः सुप्रीम कोर्ट ने रद्द कर दिया।

वर्तमान में कुल नियोजित शिक्षकों की संख्या

2003 में वे लगभग डेढ़ लाख शिक्षामित्रों की बहाली,

2006 से 2009 तक लगभग एक लाख शिक्षकों की बहाली,

तथा 2011 से लेकर 2022 तक टीईटी पास कुल डेढ़ लाख शिक्षकों को मिलाकर लगभग 4,60,000 के आसपास नियोजित शिक्षक बिहार में कार्यरत है।

आज आलम यह है कि नियोजित शिक्षक अपने वेतन से खुश नहीं है और जनता उनके काम से।


सर्व शिक्षा अभियान का शैक्षिक वातावरण के परिवर्तन में योगदान


बिहार में शिक्षा के स्तर में हुई इस व्यापक गिरावट ने कहीं ना कहीं सीधे तौर पर सर्व शिक्षा अभियान जिम्मेवार है यह कहना किसी भी तरह से बेमानी नहीं होगी। लेकिन अपने बचाव में सर्व शिक्षा अभियान ने खुद को इस प्रकार से पेश किया है कि उस पर प्रश्नचिन्ह लगाने वाले खुद ही कटघरे में आ जाएंगे क्योंकि सर्व शिक्षा अभियान के तहत प्रौढ शिक्षा, नारी शिक्षा, भारत के हर एक नागरिक तक शिक्षा की पहुंच के तहत हर टोले मोहल्ले तक प्राथमिक विद्यालयों की पहुंच, हर 3 किलोमीटर के दायरे में माध्यमिक शिक्षा की व्यवस्था इत्यादि को सम्मिलित किया गया है बिना इस पर विचार किए कि इतने बड़े व्यापक स्तर पर शिक्षकों की आपूर्ति कहां से की जाएगी और यही 1995 की सरकार के द्वारा लागू किया गया पीपीपी यानी प्राइवेट पब्लिक पार्टनरशिप योजना का असर देखने को मिलता है । जिसके तहत शिक्षा की गुणवत्ता में होने वाले यह व्यापक परिवर्तन देखने को मिला। आज सर्व शिक्षा अभियान, राष्ट्रीय माध्यमिक शिक्षा अभियान, शिक्षा के व्यवसायीकरण एवं निजी कारण के कारण शिक्षा की पहुंच भारत के कोने कोने तक एवं वंचित तबके में बैठे व्यक्तियों तक है किंतु क्या शैक्षिक गुणवत्ता में व्यापक परिवर्तन हुआ है एवं क्या सरकारी विद्यालयों में शैक्षिक वातावरण में उत्तरोत्तर सुधार हुई है या आज भी चिंता का विषय बना हुआ है। भारत के कई क्षेत्रों में सर्व शिक्षा अभियान के बाद शिक्षा के स्तर में व्यापक सुधार हुआ किंतु इसके साथ ही कई राज्यों में काफी गिरावट भी देखने को मिली है।


एक कम समय की अवधि में इतनी व्यापक स्तर पर भारत के भिन्न-भिन्न क्षेत्रों में विद्यालय खोले गए जिसमें नियुक्त होने वाले शिक्षकों को आनन-फानन में बिना शैक्षिक गुणवत्ता की पुष्टि कि उनकी नियुक्ति की गई जिसमें आगे चलकर काफी सुधार किए गए किंतु कहीं ना कहीं इतनी बड़ी और व्यापक योजना को लागू करने में सरकार को चरणबद्ध तरीके अपनाने चाहिए थे।


अगले लेख में पीपीपी यानी पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप योजना का क्या असर हमारे लोकतंत्र के चौथे स्तंभ मीडिया एवं भारत के औद्योगिक घरानों पर पड़ा इसे लेकर आएंगे।

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